संस्थापना-क्षण का स्वप्न

जिस आधार पर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की स्थापना की गई उसे संस्थापकों द्वारा 20 अक्तूबर 1965 को उदघाटन अवसर पर दिये गये उदबोधनों से पुनर्रचित किया जा सकता है। उदघाटन महोत्सव प्रारम्भ होने से पूर्व अतिथियों को एक पुस्तिका प्रदान की गई, जिसमें निदेशक प्रोफेसर निहाररंजन रे, द्वारा बनाई गई संक्षिप्त रूपरेखा थी कि ‘संस्थान क्या है और क्या इसकी आकांक्षाएँ हैं। उनके ही शब्दों में संस्थान का उद्देश्य मस्तिष्कों एवं विचारों के आदान प्रदान के लिये वे अवसर उपलब्ध करवाना है, जो हमारे ज्ञान व प्रज्ञा के क्षितिज का विस्तार करे तथा हमारे जीवन और चिन्तन में नवीन आयाम जोड़े साठ का दशक भारत के लिए अशांत साबित हो रहा था। जो देश विनाशकारी युद्ध से बड़ी मुश्किल से संभल पाया था, कृषि-क्षेत्र में अनिश्चितताओं के कारण खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहा था, उसकी पूरी शक्ति राष्ट्रीय एकीकरण पर केन्द्रित थी। संस्थान की स्थापना जिस समय हुई, और अनिश्चितता था, उसकी छाया उद्घाटन-समारोह पर भी महसूस हुई। भारतीय गणतंत्र के उपराष्ट्रपति तथा संस्थान की सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. जा़किर हुसैन ने इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए कहाः‘.... यह संस्थान एक ऐसे समय अस्तित्व में आया है जब हमारे लोगों के जीवन में दबाव और तनाव है। यह हमारी गंभीरता का प्रतीक है, कि हम मानवीय मूल्यों को किस प्रकार आंकते हैं तथा उनकी ओर कितना ध्यान देते हैं। यहां तक कि युद्ध के विध्वंस के बीच मनुष्य द्वारा शांति तथा वास्तविक जीवन के भयावह विकर्षणों के वातावरण में सत्य की खोज के प्रति हमारे विश्वास की गंभीरता भी है।’

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इस विचार को भारत के राष्ट्रपति प्रोफेसर सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने अपने उद्घाटन भाषण के दौरान विस्तारपूर्वक घोषित किया कि ‘संस्कृतियों का सम्मिलन, सभ्यताओं का सम्मिलन तथा विभिन्न दृष्टिकोणों का सम्मिलन हमारे युग की एक महानत्तम घटना है, जो हमें आभास करवाती है कि हम मात्र एक आस्था से नहीं बंधे हैं आस्थाओं की भिन्नता का भी सम्मान करते हैं। हमारा प्रयास होना चाहिए कि लोगों में एकजुटता, मित्रता बनी रहे तथा एक ऐसे जगत का निर्माण हो जहां हम प्रसन्नतापूर्वक, एकता तथा मित्रवत जीवन बसर कर सकें। इसलिए आओ अनुभव करें कि बढ़ती हुई परिपक्वता स्वंय अपनी क्षमतानुरूप अन्य दृष्टिकोणों को समझने के सक्षम हो। यही हमारी कोशिश होनी चाहिए। दो संस्कृतियों को पृथक करने वाला लौह-आवरण टूट गया है। यह अच्छा है कि हमने एक दूसरे की संस्कृतियों, सभ्यताओं व संस्कृतियों को यथासंभव पहचाना और उसकी आवश्यकता पर बल दिया। यह कमजोर आस्था का नहीं, अपितु बढ़ती परिपक्वता का प्रतीक है। यदि मनुष्य दूसरी संस्कृतियों को सहानुभूतिपूर्वक देखने में असमर्थ है तथा उनके साथ सहयोग करने में भी समर्थ नहीं हैं तो उसके अंदर मानवीय अपरिपक्वता है। हमें सहयोग की आवश्यकता है न कि संघर्ष की। ऐसे कठिन समय में शांति व सहयोग की बात करना एक बहुत ही साहसिक कार्य है। शत्रुता, विरोध व युद्ध की बात करना आसान है। हमें इस दुःसाहस पर लगाम लगानी चाहिए। हमेशा हमारा प्रयास सहयोग, भाईचारा, मित्रता स्थापित करने तथा एक ऐसा जगत निर्मित करने की ओर होना चाहिए जहां हम सब मिलजुलकर खुशी, मधुर संबंध स्थापित कर व मित्रवत जीवन बसर कर सकें। आओ ऐसे में महसूस करें कि यह बढ़ती परिपक्वता स्वंय अपनी समझ की क्षमता के अनुरूप दूसरी दृष्टिकोणों को अभिव्यक्त करे’। सन् 1965 में कही गई बात आज भी सत्य साबित होती है। यह संस्थान का विशेष अधिदेश है जो मानवीय अवस्थाओं पर भयमुक्त तथा पूर्वाग्रह रहित गहन चितंन करने के लिए बहु-अध्ययनों के लिए एक मंच प्रदान करता है।

केन्द्रीय शिक्षा मंत्री तथा शासी निकाय के अध्यक्ष श्री एम.सी. छागला ने तथ्य की महत्ता पर बल देते हुए कहा- ‘जबकि हमारी सुरक्षा व अखण्डता संकट में है फिर भी हम इस प्रकार के विलक्षण संस्थान का उद्घाटन करने के बारे में सोच रहे हैं।’ जिस संस्थान से ऐसी प्रखर आकांक्षाएं अपेक्षित थीं के बारे में श्री छागला का कहना था, ‘ यह कई प्रकार से एक अद्वितीय संस्थान है, ‘सर्वप्रथम यह एक ऐसे महल में विद्यमान है जो साम्राज्यवाद तथा वायसरीगल वैभव का प्रतीक है, हमें अब अध्येतावृति व शोध-कार्यों का एक संकेत नजर आ रहा है। दूसरे अर्थ में भी यह एक अनूठा संस्थान था क्योंकि अन्य शिक्षण संस्थानों की भांति न तो यहां कोई पाठ्यक्रम होगा, न अध्ययन-कोर्स, न कोई संकाय, न कोई परीक्षाएं और न ही कोई उपाधि प्रदान की जाएगी। हम यहां वास्तविक शोध तथा छात्रवृत्ति के लिए एक ऐसा वातावरण बनाना चाहते हैं, जहां लोग आएं, परस्पर विचार-विमर्श करें तथा ज्ञान रूपी क्षितिज का विस्तार करें।

संस्थापना के क्षण को विज्ञान प्रौद्योगिकी और मानविकी के क्षेत्रों में अन्वेषणों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता के रूप में मान्यता मिली। जैसा छागला ने कहा कि लेकिन इस खोज में हमें समय-समय पर रूकना होगा और इस तरह कि हमारे हाथ सितारों को छू लेंगे।hist

इस विचार का विस्तारपूर्वक अन्वेषण करने के लिए इसे एक बार पुनः दार्शनिक राष्ट्रपति पर छोड़ दिया गया थाः यदि हम अपने व्यवहारिक जीवन का अवलोकन करें तो एक सतत प्रगति हुई है। बैलगाड़ी के बाद साइकिल आई और साइकिल के उपरांत मोटरगाड़ी। लेकिन इससे अमानवीयता में कमी नहीं आइर्, क्योंकि मनुष्य की चेतना स्वंय इन तकनीकी अविष्कारों को यथेष्ठ रूप से प्रतिवादित करती है। मगर जब ये तकनीकी अविष्कार मात्र दिखावा बन जाएं और हम पर हावी हो जाएं तो एक प्रकार से संतुलन गड़बड़ाने का खतरा पैदा हो सकता है, जिसे हमें रोकना चाहिए। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनेक लोग जुड़े हुए हैं, आज संसार के श्रेष्ठतम मस्तिष्क परमाणु हथियारों के निर्माण के प्रति समर्पित हैं, जो जन यातना देने वाले उकरण बनाने और संस्कृति के विनाश में प्रयासरत हैं। मगर इस सभी का मशीनों व हथियारों से कोई सरोकार नहीं है, जिन्हें हम प्रयोग कर रहे हैं। इस सभी का सरोकार मनुष्य की प्रवृति से है। आज वास्तव में यह विडम्बना है कि मनुष्य यह जानता है कि क्या भला है मगर परिस्थितियों से हारकर सामने लाने में असमर्थ है। यही आज मानवीय त्रासदी है। हम सभी प्रकार के अस्त्रों का निर्माण कर चुके हैं। हम मानवीय आत्मा के उत्थान के विविध उपकरणों तथा संस्कृति का विकास कर चुके हैं। मगर हम उन्हें उन उद्देश्यों के लिए क्यों प्रयोग नहीं करते? गलती सिर्फ मानवीय स्वभाव की अपर्याप्तता में है। इसी लिए मैं सोचता हूं कि मानवताओं पर आप जो बल दे रहे हैं वह हमारी एक तरफा संस्कृति हमारे साधनों की इस कमी को सुधारेगी तथा हमारी चेतना के विकास को ऊपर उठाने और हमें स्पष्ट रूप से समझने के योग्य बनाएगी कि हम क्या करने का प्रयास कर रहे हैं?

अन्य अति महत्वपूर्ण बिन्दु जो संस्थान की दूरदर्शिता में सामने आया वह बौद्धिक स्वतंत्रता का सिद्धांत तथा इस प्रकार के मत को उस समय की सरकार के शीर्ष सदस्यों द्वारा समर्थित किया जाना था। डॉ. जा़किर हुसैन ने आशा व्यक्त की कि संस्थान आलोचनात्मक तथा रचनात्मक दोनों अनुशासित बौद्धिक गतिविधियों के लिए एक स्वतंत्र खोज के लिए एक स्थान के रूप में उभरकर सामने आएगा, जहां मस्तिष्क की असीमित स्वतंत्रता का सम्मान और विकास होता है और जहां उत्कृष्टता सब प्रकार से मार्गदर्शी नक्षत्र है।

शायद यह उल्लेख करना आवश्यक है कि संस्थान ऐसे समय में शुरू किया जा रहा था जब विश्व के अनेक हिस्सों में सरकारें बौद्धिक स्वायत्ता को सीमित करने का प्रयास कर रही थीं। इस संदर्भ में यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है कि संस्थान के निदेशक ने अपने राज्य के प्रमुख व अपनी सरकार के अग्रणी सदस्यों के समक्ष बौद्धिक स्वतंत्रता की एक जोरदार वकालत की। प्रोफेसर निहाररंजन रे के शब्दों में; ‘भारत में अपनी तरह का यह इकलौता संस्थान है। यदि मुझे कहने की अनुमति हो तो मैं कहूंगा कि उच्च स्तरीय अध्ययन व शोध की नई दिशा में यह प्रथम प्रयोग है, और यदि हम इसे सफल बनाना चाहते हैं, सृजनात्मक रूप से कहूं तो दो बातों से आश्वस्त होना पड़ेगाः (क) पूर्ण अकादमिक स्वतंत्रता तथा (ख) वित्तीय चिन्ताओं से आपेक्षिक मुक्ति। उच्च स्तरीय अध्ययन व शोध बाधित नहीं होना चाहते तथा एक बुद्धिजीवी व सत्य की खोज करने वाला दूसरों की कृपा का दास बनकर इंतजार नहीं कर सकता, निःसंदेह यह उसके परिश्रम की कीमत नहीं हो सकती। इस प्रकार के भाषणों से ऐसे प्रमाण सामने आए, राज्य प्रमुख तथा उसके मंत्री इस विचार से पूर्णतः सहमत थे। आगामी वर्षों में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान इस दृष्टि के साथ उभर कर सामने आया।